यादों का सफर

Another year has gone by and a new year is before us. As old times end and new times come we remember, we cherish, we repent and we hope for a better year ahead. Sometimes though we tend to hold on to past and find it difficult to let go. On other occasions, we try to escape from reality. Perhaps, it would be better to move on and accept life as it comes.

दिसंबर की इस सियाह तन्हा रात में,
जब बीते साल के आखरी कुछ ही पल है बाकी,
जेहन में एक सवाल आता है ।
नए साल आतें हैं , पुराने चले जातें हैं,
और हम ख्वाब बुनतें हैं , और हक़ीक़त से टकरातें हैं,
उम्मीदें लगातें हैं और कभी खुशियाँ, तो कभी निराशा पातें हैं,
कभी हँसी, कभी आँसू, कभी आस, कभी डर, कभी तन्हाई, कभी संग,
यही तो है हर बीते साल के जाने-पहचाने रंग ।
सोचता हूँ मेरे हमराही के इस साल कुछ ऐसा हो,
कि पुराने साल से नए साल के इस सफर में
बीते साल के कुछ लम्हों को भी लेकर अपने साथ चलें ,
वो लम्हे जो ख्वाब दिखे,
वो लम्हे जो खुशी बने,
वो लम्हे जो इश्क़ हुए ।
सोचता हूँ मेरे हमसफर कि नए साल का रंग हो ऐसा
जहाँ सपने हो जो टूटें नहीं,
खुशियाँ हो जो मिटे नहीं,
मीत हो जो रूठे नहीं ।
साथी मेरा हँसकर बोला, ए हमदम ,
गुज़रते वक़्त के इस सफर में बीते लम्हे साथ ना होंगें,
हाँ पर वक़्त के नए शहर में होंगें –
कुछ ख्वाब नए, कुछ खुशियाँ भी
कुछ उम्मीदें, कुछ आशाएँ
और साथ में होंगें रंजो-गम
वक़्त के नए शहर को हम,
हर रंग में अपनाएगें,
और आने वाले साल को बीते साल से बेहतर बनायेगें ।

IAS Officer, Secretary to Government of Gujarat. Municipal Commissioner, Vadodara.

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