ये मसाइले तसव्वुफ ये तेरा बयान गालिब

img-20161225-wa0122Ghalib is to Urdu, what Shakespeare is to English! He is without doubt the most influential and most popular Urdu Shayar and perhaps one of the most important writer of last 500 years in India.

कह्ते हैं (और सच भी है ) के गालिब के कलाम में गहराई(depth) भी है और घिराई (range ) भी । उदाहरण के तौर पर-
“ है परे सरहद-ए-इदराक से अपना मस्जूद, किब्ले को एह्ल-ए-नज़र किब्ला-नुमा कहते हैं ”

ऊपर कहे गये शेर में Sufism और Mysticism का फलसफा गालिब ने बडी खूबी से समझाया है जो उनकी सोच की गहराई को दिखाता है |
दूसरी तरफ –
“ दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है,
आखिर इस दर्द की दवा क्या है “

ये शेर गालिब की शायरी की range दिखाता है- क्योंकि इसे अलग- अलग तरीके से अलग- अलग मौकों पर कहा जा सकता है |

लेकिन गालिब की गहराई और घिराई सिर्फ अलग-अलग शेरों की choice में ही नहीबल्की इसका scope तो उनकी पूरी शायरी में है | गालिब के शेर, गालिब की गज़ल के मायने,उनका interpretation,सामने वाले की कैफियत पर depend करता है । वैसे तो गालिब 19वी सदी के शायर हैं, पर इस नज़र से देखा जाये तो गालिब की सोच, उनका creative expression, उनकी poetry में आपको modernism की झलक मिलेगी ( multiple perspective, self- referentiality, use of metaphors in a new way) और शायद (post-modernism) की आहट भी ।

आज ऐसे ही दीवान-ए-गालिब उठाया randomly एक पन्ना खोलाऔर पह्ला सफा पढा-

“ मुद्दत हुई है यार को मेह्मां किये हुए,
जोश-ए-कदह से बज्म चरागां किये हुए “

मैं हैरान हूँ- आज भी जब दिल किसी पुराने दोस्त को याद करता हो, आज भी जब हम अपने आप को कहीं खोजना चाहतें हैं, आज भी जब बचपन की को याद अनायास आ जाये, आज भी जब कोई पूरानी छूटी हुई hobby फिर से अज़माने को जी चाहे – इन सारी कैफियत में ये शेर कैसे एकदम फिट बैठता है | ये है गालिब की गहराई और घिराई | और ये किसी एक शेर या एक गज़ल के लिये ही नहीं बल्की गालिब की सारी poetry के लिये सच है |

img-20161225-wa0121शायद इसीलिये गालिब इतिहास के उन चुनिंदा लेखकों में से हैं जिनकी लेखनी कालजयी है, जिनकी अपील universal है |  पिछले दिनों चांदनी चौक में गालिब की हवेली को ( जो अब एक स्मारक में तब्दील की जा चुकी है) देखने का मौका मिला | बल्ली मारान की संकडी गलियों में एक अलग अंदाज़ में गालिब से रुबरु होने का अवसर मिला, एक सूफी का तस्सवुर हुआ और दिल से आवाज़ आई-

“आतें हैं गैब (hidden/supernatural ) से ये मज़ामीं खयाल (themes of idea )में
गालिब सरीर-ए-खामा(sound of scratching of pen ), नवा-ए-सरोश (voice of angel ) है”

(These themes of ideas come from hidden, 0′ Ghalib, the sound of scratching of pen is actually the voice of angel ).

 

IAS Officer, Secretary to Government of Gujarat. Municipal Commissioner, Vadodara.

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