गाँवों की हलचल रुक सी गई, सो गया शहर का कोलाहल जन-जीवन ऐसे सुस्त हुआ दैनिकता जैसे मूर्च्छा पर । सब कहते है ये महा -समर, धरती पर छाया गहन तिमिर चिंता में सब ये सोच रहे कैसे होगा ये समय बसर पर देखो इस आँधी में भी , कुछ लोग लगे कर्त्तव्य रत, सोचो इनके साहस को तुम पा जाओगे सहज संबल ये सच है मानवता सहमी जग की रौनक जैसे है छिनी पर जुड़े हुए हैं सब फिर …


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