करवटों से काम चले तो फिर सनम को पूछे कौन, रात अगर यूँ कट जाए तो फिर ख़्वाबों को पूछे कौन। सांसों की हल्की आहट में जब दिल बहल-सा जाता है, धड़कन ही हमराज़ बने तो जज़्बातों को पूछे कौन। नींद रूठी रहे मगर वो चाँद खिड़की पे ठहरा हो, ऐसी तन्हा रातें हों तो मुलाक़ातों को पूछे कौन। तकिए में सिमटी यादें जब ख़ुद ही गले लगाती हों, बिन छुए ही मिल जाएँ तो एहसासों को पूछे कौन। कुछ …
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एक और एक मिलकर दो हुए, यह गणित की मिसाल है, एक और एक को मिलने न दें, यह कूटनीति की चाल है।। एक और एक जब ग्यारह बनें, यह संगठन की जीत है, एक और एक जब एक ही रहें, यह सच्चे प्रेम की रीत है।। एक को एक के विरुद्ध करें, यह राजनीति का खेल है, एक और एक जब अनगिनत बनें, तब क्रांति की बेल है।।
जब शाम ढले, पर कोई राह न देखे, सुबह उजाले में, कोई संग ना चले। राहें खुली हों, मगर मंज़िलें धुंधली, कोई रोकने वाला न हो, न कोई संभाले। ख़्वाबों का शहर हो, पर सन्नाटे गहराए, शब्दों का समंदर हो, पर जज़्बात जम जाएं। खुला आसमान हो, मगर परों में भार हो, सफ़र तो हो, पर हमसफ़र की दरकार हो। क्या यही आज़ादी है, जो दिल को रास आए? या फिर ये तन्हाई है, जो धीरे-धीरे खाए?




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